आदिवासी आश्रमों पर संकट: पढ़ाई–लिखाई छोड़ ‘दाल-भात केंद्र’ में तब्दील हुए आश्रम, बच्चों की सुरक्षा और भविष्य अधर में सरकार की मंशा थी कि आदिवासी और पिछड़े वर्ग के बच्चे सुरक्षित माहौल में रहकर पढ़ाई-लिखाई और संस्कारों के साथ आगे बढ़ें। इसी सोच के तहत छात्रावास और आश्रम शालाओं की नींव रखी गई थी। लेकिन हकीकत यह है कि कबीरधाम जिले के आदिवासी आश्रम अब पढ़ाई और सुरक्षा की बजाय “दाल-भात केंद्र” में तब्दील होते जा रहे हैं।
बिना अधीक्षक, बच्चों की पढ़ाई ठप
कबीरधाम जिले में 100 से अधिक छात्रावास और आश्रम शालाएं संचालित हैं, मगर कई आश्रमों में स्थायी अधीक्षक नहीं हैं। नतीजा यह कि बच्चों की शिक्षा, सुरक्षा और योजना का उद्देश्य अधर में लटक गया है।
मामला 1 चेंद्रादादर आश्रम बोडला विकासखंड मुख्यालय से लगभग 60 किलोमीटर दुर्गम पहाड़ी इलाके में स्थित।
बैगा जनजाति समुदाय की बाहुल्यता वाला क्षेत्र।
यहाँ के आदिवासी बालक आश्रम का प्रभार राघवेंद्र धु्रव (अधीक्षक, प्री-मैट्रिक आदिवासी बालक छात्रावास बोडला) को अतिरिक्त रूप से दिया गया है।
सवाल: इतनी दूरस्थ और कठिन भौगोलिक परिस्थिति में अधीक्षक कैसे नियमित देखरेख करेंगे ।
मामला 2 चोरभट्टी आश्रम पंडरिया मुख्यालय से लगभग 35 किलोमीटर दूर।
इस आदिवासी बालक आश्रम का अतिरिक्त प्रभार अनिल कौशिक (अधीक्षक, प्री-मैट्रिक अनुसूचित जाति बालक छात्रावास पंडरिया) को सौंपा गया।
बच्चों की सुरक्षा और अनुशासन की निगरानी कैसे संभव ।
सवालों के घेरे में शासन-प्रशासन
बिना अधीक्षक आश्रमों में बच्चों की शिक्षा और संस्कारों का क्या होगा?
सुरक्षा की निगरानी और योजनाओं के क्रियान्वयन की पूर्ति कैसे होगी?
क्या सरकार की मंशा सिर्फ “भोजन परोसने” तक सीमित रह गई है। आदिवासी आश्रमों में पढ़ाई-लिखाई ठप, बच्चे असुरक्षित, और योजनाएं कागजों में सिमटकर रह गईं। यह तस्वीर न केवल छत्तीसगढ़ बल्कि पूरे देश की आदिवासी शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती है।