बोड़ला में अधिकारी संलग्न, लोहारा में दो साल से प्रभार, प्रशासनिक व्यवस्था कठघरे में
कवर्धा। जनपद पंचायत बोड़ला के प्रभारी मुख्य कार्यपालन अधिकारी आकाश सिंह को जिला पंचायत कबीरधाम में संलग्न किए चार दिन बीत चुके हैं, लेकिन प्रशासनिक गलियारों से लेकर क्षेत्र तक इस फेरबदल की चर्चा थमने का नाम नहीं ले रही है। करीब एक वर्ष तक बोड़ला जैसे महत्वपूर्ण और संवेदनशील विकासखंड की जिम्मेदारी संभालने वाले अधिकारी को अचानक जिला पंचायत में संलग्न किए जाने के पीछे आखिर प्रशासनिक जरूरत क्या थी, इसे लेकर सवाल उठ रहे हैं। आदेश में संलग्नीकरण का कारण स्पष्ट नहीं होने से चर्चाओं को और हवा मिल रही है।
बोड़ला जनपद क्षेत्र उपमुख्यमंत्री एवं पंचायत मंत्री विजय शर्मा के विधानसभा क्षेत्र का हिस्सा है। ऐसे में यहां होने वाले महत्वपूर्ण प्रशासनिक बदलावों पर क्षेत्र की नजर स्वाभाविक रूप से बनी रहती है। हालांकि आकाश सिंह के संलग्नीकरण को उपमुख्यमंत्री एवं पंचायत मंत्री विजय शर्मा से जोड़ने का कोई आधिकारिक आधार सामने नहीं आया है। इसलिए इससे जुड़ी चर्चाओं की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
करीब एक साल में व्यवस्था समझी, फिर अचानक संलग्नीकरण
आकाश सिंह ने करीब एक वर्ष तक बोड़ला जनपद पंचायत में प्रभारी मुख्य कार्यपालन अधिकारी के रूप में जिम्मेदारी संभाली। इस दौरान पंचायतों के कामकाज, विकास योजनाओं की निगरानी और स्थानीय प्रशासनिक परिस्थितियों से वे परिचित हुए। पंचायत स्तर पर समन्वय और योजनाओं के क्रियान्वयन को लेकर भी उनके कार्यकाल की चर्चा होती रही।
ऐसे में संलग्नीकरण के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब एक अधिकारी ने करीब एक साल में क्षेत्र की पंचायत व्यवस्था, स्थानीय परिस्थितियों और विकास कार्यों को समझ लिया था, तब अचानक उनकी जिम्मेदारी बदलने की प्रशासनिक आवश्यकता क्यों पड़ी।
सहसपुर लोहारा में दो साल से प्रभार
बोड़ला की व्यवस्था को लेकर सवाल इसलिए और गंभीर हो जाते हैं क्योंकि जिले के सहसपुर लोहारा विकासखंड में विकास अधिकारी शिव कुमार साहू करीब दो वर्षों से पदस्थ हैं और उन्हें जनपद पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी का प्रभार भी सौंपा गया है।
एक तरफ बोड़ला में करीब एक वर्ष तक जिम्मेदारी संभालने वाले प्रभारी सीईओ को जिला पंचायत में संलग्न कर दिया गया, वहीं दूसरी ओर सहसपुर लोहारा में करीब दो वर्षों से विकास अधिकारी को ही जनपद सीईओ का प्रभार देकर व्यवस्था चलाई जा रही है।
प्रभार व्यवस्था जरूरत के समय प्रशासनिक विकल्प हो सकती है, लेकिन जब यही व्यवस्था वर्षों तक चलती है तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि नियमित पदस्थापना और अतिरिक्त प्रभार के लिए प्रशासनिक कसौटी क्या है।
पीओ का पद, व्यवस्था फिर उलटी
जिले की प्रशासनिक व्यवस्था में एक और मामला चर्चा में है। सहायक प्रोग्रामर दिलीप साहू को कार्यक्रम अधिकारी यानी पीओ का प्रभार दिया गया है, जबकि कार्यक्रम अधिकारी सेव चंद्रवंशी को जिला पंचायत में संलग्न किया गया है।
इस व्यवस्था ने जिम्मेदारियों के बंटवारे को लेकर भी सवाल खड़े किए हैं। जिस अधिकारी के पास नियमित रूप से कार्यक्रम अधिकारी की जिम्मेदारी थी, उसे जिला पंचायत में संलग्न किया गया और उसके स्थान पर सहायक प्रोग्रामर को पीओ का प्रभार दे दिया गया।
एक ओर अधिकारी को उसके कार्यक्षेत्र से हटाकर संलग्न किया जा रहा है, दूसरी ओर दूसरे अधिकारी (कम योग्यता )को अतिरिक्त जिम्मेदारी देकर व्यवस्था चलाई जा रही है। यही विरोधाभास अब प्रशासनिक व्यवस्था की एकरूपता पर सवाल खड़े कर रहा है।
प्रशासनिक व्यवस्था के शिकार कितने अधिकारी
जिले में यह सवाल भी उठ रहा है कि ऐसे कितने अधिकारी और कर्मचारी होंगे, जो लंबे समय से प्रभार, संलग्नीकरण अथवा अस्थायी व्यवस्था के बीच काम कर रहे होंगे। कहीं वर्षों से अतिरिक्त प्रभार जारी है, तो कहीं जिम्मेदारी संभाल रहे अधिकारी को अचानक दूसरी जगह संलग्न कर दिया जाता है।
प्रभार व्यवस्था का उद्देश्य यदि केवल अस्थायी प्रशासनिक आवश्यकता पूरी करना है तो उसका लंबे समय तक जारी रहना भी समीक्षा का विषय होना चाहिए। वहीं बार-बार जिम्मेदारी बदलने से योजनाओं की निगरानी और विकास कार्यों की निरंतरता प्रभावित होने की आशंका रहती है।
बोड़ला में नई व्यवस्था, नई चुनौती
कलेक्टर कबीरधाम के आदेश के अनुसार आकाश सिंह को आगामी आदेश तक जिला पंचायत में कार्य करने के लिए संलग्न किया गया है। उनके स्थान पर जिला पंचायत में प्रभारी सहायक परियोजना अधिकारी के रूप में कार्यरत योगेश वर्मा को जनपद पंचायत बोड़ला के सीईओ का अस्थायी रूप से समस्त प्रभार सौंपा गया है।
अब योगेश वर्मा के सामने बोड़ला की पंचायत व्यवस्था, लंबित विकास कार्यों और शासन की योजनाओं में प्रशासनिक निरंतरता बनाए रखने की चुनौती होगी। दूसरी ओर जिला पंचायत में आकाश सिंह के अनुभव का उपयोग किस जिम्मेदारी में किया जाता है, यह आने वाले समय में स्पष्ट होगा।
फैसला प्रशासन का, नजर जनता की
प्रशासनिक फेरबदल शासन की सामान्य प्रक्रिया है। कार्यहित और प्रशासनिक आवश्यकता के आधार पर अधिकारियों की जिम्मेदारी बदली जा सकती है। लेकिन जब एक अधिकारी को करीब एक वर्ष बाद संलग्न किया जाता है, दूसरे विकासखंड में करीब दो वर्षों से अतिरिक्त प्रभार चलता है और कार्यक्रम अधिकारी को जिला पंचायत भेजकर सहायक प्रोग्रामर को पीओ का प्रभार दिया जाता है, तो मामला केवल एक आदेश तक सीमित नहीं रहता।
यह पूरी प्रभार और संलग्नीकरण व्यवस्था की पारदर्शिता, एकरूपता और प्रशासनिक कसौटी का सवाल बन जाता है।
बोड़ला में नई व्यवस्था लागू हो चुकी है, लेकिन प्रशासनिक गलियारों में चर्चा अभी भी जारी है। एक तरफ अधिकारी को क्षेत्र से हटाकर जिला पंचायत में संलग्न किया गया, दूसरी तरफ दूसरे विकासखंड में वर्षों से प्रभार की व्यवस्था कायम है। ऐसे में प्रशासनिक फैसलों का अलग-अलग पैमाना होने की धारणा को बल मिलना स्वाभाविक है।
आदेश प्रशासन का है, लेकिन व्यवस्था की पारदर्शिता की जिम्मेदारी भी प्रशासन की ही है।