भोजली पर्व का उत्साह में जिला पंचायत सदस्य एवं सभापति दीपा-पप्पू धुर्वे वनाचल की खुशहालियो में शामिल हुई 

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भोजली पर्व का उत्साह में जिला पंचायत सदस्य एवं सभापति दीपा-पप्पू धुर्वे वनाचल की खुशहालियो के शामिल

ग्रामीण बच्चों में दिखा भोजली पर्व का उत्साह में  जिला सदस्य दीपा पप्पू वनाचल की खुशहालियो के शामिल विकासखंड पंडरिया के अंतर्गत आस-पास के गांवों में कामठी, भेड़ागढ़, पोलमी, माठपुर, डालामौहा, छोटे-छोटे बच्चों में भोजली को देखकर भारी उत्साह देखने को मिला सुबह से ही छोटे-छोटे बच्चे स्नान करके नए कपड़े पहनकर शाम का समय का इंतजार कर रहे होते है।भोजली पर्व हमारे छत्तीसगढ़ के प्रमुख त्योहारों में से एक है भोजली का अर्थ है भो+जली अर्थात भूमि में जल हो।यह पर्व जो हर साल सावन महीने के शुक्ल पक्ष के सप्तमी के दिन बोया जाता है इसे छोटी॑-छोटी टोकरियों में मिट्टी डालकर उनमें अन्न के दाने बोए जाते हैं। ये दाने धान, गेहूँ, जौ के हो सकते तीज या रक्षाबंधन के अवसर पर फसल की प्राण प्रतिष्ठा के रूप में इन्हें छोटी टोकरी या गमले में उगाया जाता हैं। जिस टोकरी या गमले में ये दाने बोए जाते हैं उसे घर के किसी पवित्र स्‍थान में छायादार जगह में स्‍थापित किया जाता है। उनमें रोज़ पानी दिया जाता है और देखभाल की जाती है। दाने धीरे-धीरे पौधे बनकर बढ़ते हैं, महिलायें उसकी पूजा करती हैं एवं जिस प्रकार देवी के सम्‍मान में देवी-गीतों को गाकर जवांरा– जस – सेवा गीत गाया जाता है वैसे ही भोजली दाई (देवी) के सम्‍मान में भोजली सेवा गीत में महिलाएं गंगा देवी को सम्बोधित करती हुई गाती है –

देवी गंगा देवी गंगा लहर तुरंगा हमरो भोजली देवी के

भीजे ओठों अंगा।

मांड़ी भर जोंधरी

पोरिस कुसियारे

जल्दी जल्दी बाढ़ौ भोजली हो वौ हुसियारे।गाते हुवे गाव को चक्कर लगा कर नदी,तालाब के किनारे भोजली देवी का विसर्जन किया जाता है।विसर्जन करते वक्त उस भोजली में से कुछ लेकर अपने भाई के कानो में लगा देते है जिससे भाई – बहन के रिश्तो में मित्रता भी बनी रहती है.भोजली से हम किसी को दोस्त बनाने के लिए भी उसके कान में भोजली को लगाकर उसे दोस्त बना लेते है कहा जाता है की जो भोजली से जो दोस्ती बनती वह कभी नहीं टूटती है।

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