पंडरिया ब्लॉक के पहाड़ी वनांचल में कुटकी फसल की मिंजा ई शुरू हो गई है। कुटकी एक लघु धान्य फसल है, जिसकी कटाई के बाद दाने निकालने के लिए पारंपरिक तरीके से मिसाई (गहाई) का काम किया जाता है। मैदानी क्षेत्रों में जहां हार्वेस्टर जैसे आधुनिक यंत्रों से फसल की कटाई और मिंजाई होती है, वहीं पहाड़ी क्षेत्रों में आज भी बैलों की शक्ति का उपयोग कर पारंपरिक तरीका अपनाया जा रहा है।इस प्रक्रिया को स्थानीय भाषा में दौरी, कहा जाता है। इसमें 7 से 10 बैलों को एक साथ बांधकर फसल के ऊपर चलाया जाता है। बैलों के चलने से दाने भूसे से अलग हो जाते हैं और मिसाई का काम पूरा होता है। फसल पकने पर कोदो और कुटकी को जमीन की सतह से कटाई करके खलियान में सुखाया जाता है। इसके बाद बैलों से गहाई की जाती है और उड़ावनी के माध्यम से दाने को भूसे से अलग किया जाता है। पहाड़ी क्षेत्रों में 8-10 बैलों की जोड़ी को कैलारी के सहारे इस्तेमाल किया जाता है। इस परंपरागत प्रक्रिया से मिंजाई का काम ज्यादा कुशल और तेज होता है। बैलों के जरिये कैलारी का उपयोग लागत-प्रभावी होने के साथ-साथ पहाड़ी इलाकों में मशीनों की कम उपलब्धता के लिए व्यावहारिक भी है। यह तरीका उनकी परंपरा का हिस्सा है।