रायपुर: पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के छह वर्ष पूर्ण होने पर संगोष्ठी आयोजित

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रायपुर, छत्तीसगढ़, 29 जुलाई 2026 पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय के इंस्टीट्यूट इनोवेशन काउंसिल द्वारा आयोजित विषय “ 6 एनिवर्सरी ऑफ़ नेशनल एजुकेशन पालिसी 2020” का आयोजन दिनांक 29 जुलाई 2026 , सावित्री बाई फुले हॉल, शिक्षक शिक्षा संस्थान में किया गया।
इंस्टीट्यूट इनोवेशन काउंसिल, शिक्षक शिक्षा संस्थान, मालविया मिशन टीचर ट्रेनिग सेंटर, इलेक्ट्रॉनिक्स & फोटोनिक्स अध्ययनशाला एवं अक्षय उर्जा विभाग के संयुक्त तत्वाधान में कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में प्रोफेसर जी.ए.घनश्याम ,माननीय कुलपति सच्चिदानंद शुक्ल,डॉ प्रीति सुरेश,डॉ कविता ठाकुर सहित कई प्रमुख शिक्षाविद ,शिक्षक और छात्र उपस्थित रहे।
कार्यक्रम की शुरुआत मां सरस्वती के आशीर्वाद के साथ दीप प्रज्वलित कर की गई इसके पश्चात कुलगीत गायन किया गया| यह कार्यक्रम माननीय कुलपति प्रो. सच्चिदानंद शुक्ल के मार्गदर्शन में आयोजित किया गया, जो सदैव ऐसे कार्यक्रमों के लिए प्रेरणा स्रोत रहे हैं।
इसके पश्चात डॉ. कविता ठाकुर, विभागाध्यक्ष, इलेक्ट्रॉनिक्स एंड फोटोनिक्स, पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर द्वारा स्वागत भाषण के साथ हुआ। ततपश्चात माननीय कुलपति सच्चिदानंद शुक्ल ने एनइपी 2020 के प्रमुख बिंदु को उजागर किया उन्होंने बताया की 1968 और 1986 के बाद, 34 वर्षों के अंतराल पर वैज्ञानिक डॉ. के. कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता में लोकतांत्रिक परामर्श प्रक्रिया के तहत एनइपी 2020 तैयार की गई। जो 5 मूल स्तंभ नीति अभिगम्यता, समता, गुणवत्ता, वहनीयता, और जवाबदेही पर आधारित है। तथा छत्तीसगढ़ एवं उत्तर प्रदेश में क्रियान्वयन की स्थिति में बताया की छत्तीसगढ़ में एनइपी 2020 को उच्च शिक्षा में सत्र 2024 से औपचारिक रूप से लागू किया गया। उत्तर प्रदेश एनइपी 2020 को शुरुआती दौर (2021-22) में लागू करने वाले प्रमुख राज्यों में से एक रहा है। उत्तर प्रदेश ने सभी राज्य विश्वविद्यालयों के लिए एक कॉमन मिनिमम सिलेबस लागू किया और कौशल विकास को मुख्य पाठ्यक्रम से जोड़ा। इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रोफेसर जी. ए. घनशयाम, प्रिंसिपल, गवर्नमेंट नवीन कॉलेज कुई – कुक्दुर, कबीरधाम उपस्थित रहे|
प्रोफेसर जी. ए. घनशयाम अपने व्याखान की सुरुआत करते हुए बताते हैं की उच्च शिक्षा में भारतीय ज्ञान प्रणालियों के समावेश एवं उनके वैज्ञानिक आधार को उजागर करने के उद्देश्य से प्रोफेसर जी. ए. घनशयाम द्वारा “भारतीय ज्ञान परंपरा एवं आधुनिक विज्ञान” विषय पर एक विस्तृत एवं प्रेरणादायी व्याख्यान प्रस्तुत किया गया। व्याख्यान के दौरान उन्होंने डिजिटल प्रस्तुतियों एवं ऐतिहासिक साक्ष्यों के माध्यम से प्राचीन भारतीय , विज्ञान, प्रौद्योगिकी और दर्शन के गहन अंतरसंबंधो को रेखांकित किया। प्रो. घनश्याम ने अपने व्याखान में स्पष्ट किया कि भारतीय ज्ञान परंपरा केवल सांस्कृतिक धरोहर तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दृष्टि, परंपरा और लौकिक प्रयोजन के सुदृढ़ सिद्धांतों पर आधारित है। इसका मूल उद्देश्य ज्ञान का केवल संरक्षण करना नहीं, बल्कि नवाचार, बौद्धिक विकास और जन-कल्याण के लिए उसकी सामाजिक उपयोगिता को सुनिश्चित करना है। प्राचीन ज्ञानर्षि एवं आधुनिक विज्ञान से तुलना:व्याख्यान में महर्षि कणाद के वैशेषिक दर्शन में प्रतिपादित ‘परमाणुवाद’ की तुलना आधुनिक जॉन डाल्टन और आइजैक न्यूटन के सिद्धांतों से की गई। इसके अतिरिक्त आर्यभट्ट, ब्रह्मगुप्त, बौधायन, चरक, सुश्रुत, वराहमिहिर, भास्कराचार्य द्वितीय, पाणिनि, पतंजलि और नागार्जुन जैसे प्राचीन वैज्ञानिकों एवं विचारकों के गणित, खगोलिकी, शल्य चिकित्सा, रसायन विज्ञान और भाषाविज्ञान में योगदान को प्रस्तुत किया गया। स्थापत्य एवं खगोलीय चमत्कार ढोलवीरा (गुजरात) कच्छ में उत्खनन से प्राप्त 14 मीटर चौड़ी दीवार का उल्लेख करते हुए प्राचीन सुनामी प्रबंधन और आपदा रोधी सिविल इंजीनियरिंग की सराहना की गई। दिल्ली का लौह स्तंभ, जंतर-मंतर तथा खिद्रापुर (महाराष्ट्र) के कोपेश्वर मंदिर की जटिल स्थापत्य कला को प्राचीन भारतीय शिल्पकला का अद्वितीय प्रमाण बताया गया।
छत्तीसगढ़ का समृद्ध योगदान छत्तीसगढ़ की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक ज्ञान परंपरा पर विशेष प्रकाश डालते हुए फरसगांव, चंदेरी एवं गोडीचोरा (कांकेर/बस्तर क्षेत्र) की 10,000 वर्ष पुरानी शैल चित्रों का उल्लेख किया गया। साथ ही, पारंपरिक औषधि के क्षेत्र में पद्मश्री श्री हेमचंद मांझी (2024) एवं काष्ठ कला में पद्मश्री श्री अजय कुमार मंडावी (2023) के योगदान को भारतीय ज्ञान परंपरा का जीवंत उदाहरण प्रस्तुत किया गया। पंचकोश सिद्धांत एवं अनुभवात्मक अधिगम राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के आलोक में तैत्तिरीय उपनिषद के पंचकोश सिद्धांत की व्याख्या की गई। प्रो. घनश्याम ने रटंत विद्या के स्थान पर अनुभवात्मक अधिगम, मानसिक स्वास्थ्य, मनोवैज्ञानिक परामर्श और समग्र कौशल विकास को अपनाने पर जोर दिया।
वैश्विक विचारकों की स्वीकार्यता एवं पारंपरिक ज्ञान संरक्षण व्याख्यान में मार्क ट्वेन, वर्नर हाइजेनबर्ग और इरविन श्रोडिंगर जैसे वैश्विक वैज्ञानिकों और विचारकों के कथनों को उद्धृत किया गया, जिन्होंने भारतीय वेदान्त और दर्शन को क्वांटम भौतिकी की अवधारणाओं को समझने में सहायक माना। इसके साथ ही, वर्ष 1996 में सिएसआईआर द्वारा हल्दी के घाव भरने वाले गुणों पर अमेरिकी पेटेंट को सफलतापूर्वक रद्द कराने के ऐतिहासिक मामले का उल्लेख करते हुए स्वदेशी ज्ञान और बौद्धिक संपदा अधिकारों के संरक्षण की आवश्यकता बताई गई।
प्रो. घनश्याम ने तक्षशिला, नालंदा और उज्जैनी जैसे प्राचीन अंतरराष्ट्रीय आवासीय विश्वविद्यालयों की गौरवशाली परंपरा का स्मरण कराते हुए कहा कि पाश्चात्य केंद्रित दृष्टिकोण से इतर अपनी जड़ों की ओर लौटना समय की मांग है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के सिद्धांतों को अपनाकर ही हम विद्यार्थियों में नैतिक नेतृत्व, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, आलोचनात्मक सोच और राष्ट्रीय चेतना का विकास कर ‘विकसित भारत 2047’ के लक्ष्य को साकार कर सकते हैं।
अंत में आयोजकों द्वारा मुख्य अतिथि, विशिष्ट अतिथियों एवं सभी प्रतिभागियों का आभार व्यक्त किया गया। यह कार्यक्रम विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों के लिए उद्यमिता, नवाचार तथा राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के छह वर्षों की उपलब्धियों, नवाचार, गुणवत्ता शिक्षा और समग्र विकास को बढ़ावा देना। प्रोफेसर सि. डी. अगाशे, विभागाध्यक्ष, कार्यक्रम समन्वयक, शिक्षक शिक्षा संस्थान | प्रोफेसर कविता ठाकुर, अध्यक्ष, इंस्टीट्यूट इनोवेशन काउंसिल एवं विभागाध्यक्ष। इस कार्यक्रम में र वि वि से प्रो. प्रीति के. सुरेश, निर्देशक एम्एम् टीटीसी, के साथ ही इस कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के शिक्षक शिक्षा संस्थान, इलेक्ट्रॉनिक्स एंड फोटोनिक्स अक्षय ऊर्जा प्रौद्योगिकी एवं शिक्षक शिक्षा संस्थान के लगभग 120 विद्यार्थी सहित इस कार्यक्रम में र वि वि से अक्षय ऊर्जा प्रौद्योगिकी, इलेक्ट्रॉनिक्स एंड फोटोनिक्स अध्ययन शाला एवं शिक्षक शिक्षा संस्थान के शिक्षक गण उपस्थित रहे। कार्यक्रम का सफल संचालन लक्ष्मी कोटरे के द्वारा किया गया |

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