इलाज मिलता तो बच जाती बबिता? आदिवासी छात्रावास में 7वीं की छात्रा की मौत पर उठे सवाल

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अमेरा आदिवासी छात्रावास में छात्रा बबिता की मौत पर गरमाई राजनीति, आदिवासी कांग्रेस प्रदेश सचिव कृष्णा पुसाम ने उठाए सवाल
कवर्धा। जिले के बैजलपुर चौकी क्षेत्र अंतर्गत अमेरा आदिवासी कन्या छात्रावास में कक्षा 7वीं की छात्रा बबिता पन्द्राम की मौत का मामला अब तूल पकड़ता जा रहा है। छात्रा की मौत को लेकर परिजनों ने छात्रावास प्रबंधन और आदिम जाति कल्याण विभाग पर लापरवाही के गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि यदि समय पर इलाज मिल जाता तो बबिता की जान बच सकती थी।
इस मामले को लेकर आदिवासी कांग्रेस के प्रदेश सचिव कृष्णा पुसाम ने भी चिंता जताते हुए छात्रावास व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि एक मासूम छात्रा की मौत बेहद दुखद है। उन्होंने मांग की कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर दोषियों पर कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो।
परिजनों के अनुसार, 27 जुलाई की रात बबिता पन्द्राम की अचानक तबीयत बिगड़ गई थी। आरोप है कि उस समय छात्रावास में अधीक्षिका मौजूद नहीं थीं और छात्रा को तत्काल अस्पताल पहुंचाने या चिकित्सकीय सहायता उपलब्ध कराने की व्यवस्था नहीं की गई। परिजनों का दावा है कि बच्ची पूरी रात गंभीर हालत में रही, लेकिन उसे समय पर उपचार नहीं मिल सका।
परिवार का आरोप है कि उन्हें रात करीब तीन बजे सूचना दी गई। सूचना मिलने के बाद वे तत्काल छात्रावास पहुंचे, लेकिन उनका कहना है कि वहां भी उन्हें अंदर जाने से रोका गया। बाद में जब वे बबिता को अस्पताल ले जाने के लिए निकले तो रास्ते में ही उसकी मौत हो गई।
परिजनों ने सवाल उठाया है कि छात्रावास में रहने वाली बच्चियों की सुरक्षा और स्वास्थ्य की जिम्मेदारी विभाग की होती है। यदि छात्रा की तबीयत रात में बिगड़ी थी तो उसे तत्काल चिकित्सा सुविधा क्यों नहीं दी गई? एम्बुलेंस या अन्य जरूरी व्यवस्था समय पर क्यों नहीं की गई?
घटना के बाद परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल है। उन्होंने आरोप लगाया कि कई आदिवासी छात्रावासों में निगरानी व्यवस्था कमजोर है और जिम्मेदार अधिकारी नियमित रूप से व्यवस्था की मॉनिटरिंग नहीं करते। उन्होंने पूरे मामले की जांच कर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है।
मामले में आदिम जाति कल्याण विभाग की अधिकारी लक्ष्मी पटेल से पक्ष जानने का प्रयास किया गया, लेकिन उन्होंने कैमरे पर बयान देने से इनकार कर दिया। वहीं, प्रशासनिक पक्ष जानने के लिए कवर्धा कलेक्टर गोपाल वर्मा से भी संपर्क करने की कोशिश की गई, लेकिन कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
फिलहाल मामले की जांच जारी है। जांच के बाद ही यह स्पष्ट हो पाएगा कि छात्रा की मौत के पीछे वास्तविक कारण क्या थे और यदि किसी स्तर पर लापरवाही हुई है तो जिम्मेदारी किसकी तय होगी।
यह घटना सरकारी आदिवासी छात्रावासों में बच्चों की सुरक्षा, स्वास्थ्य सुविधा और प्रबंधन व्यवस्था को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े कर रही है। अब सभी की नजर प्रशासन की जांच और आगे की कार्रवाई पर टिकी हुई है।

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