कबीरधाम मनरेगा: शासन के आदेश के विपरीत सहायक प्रोग्रामर को मिला कार्यक्रम अधिकारी का अतिरिक्त प्रभार

lok sev
previous arrow
next arrow
शिकायतों के बाद भी संरक्षण का खेल, मनरेगा में नियमों को ताक पर रख जिम्मेदारों को मिला अतिरिक्त प्रभार
कबीरधाम जिले में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के संचालन को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। राज्य शासन के स्पष्ट निर्देशों और लगातार उठ रही शिकायतों के बावजूद कार्रवाई के बजाय संरक्षण देने के आरोप तेज हो गए हैं। मामला ऐसे समय में सामने आया है जब पंचायत विभाग पारदर्शिता और जवाबदेही के दावे कर रहा है।
राज्य मनरेगा आयुक्त कार्यालय द्वारा 1 दिसंबर 2018 को जारी पत्र क्रमांक 4644/वि-7/MGNREGA/2018 में स्पष्ट रूप से कहा गया था कि स्वीकृत राशि से अधिक व्यय एवं वित्तीय अनियमितता की स्थिति में संबंधित कार्यक्रम अधिकारी एवं सहायक प्रोग्रामर दोनों जिम्मेदार होंगे तथा उनके विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी।
इसके बाद 20 अप्रैल 2022 को राज्य कार्यालय ने एक और महत्वपूर्ण आदेश जारी करते हुए स्पष्ट निर्देश दिए कि कार्यक्रम अधिकारियों एवं सहायक परियोजना अधिकारियों की अनुपस्थिति अथवा रिक्त पद की स्थिति में अतिरिक्त प्रभार विभागीय सहायक परियोजना अधिकारियों अथवा ग्रामीण यांत्रिकी सेवा के अधिकारियों को सौंपा जाए, ताकि प्रशासनिक व्यवस्था नियमों के अनुरूप संचालित हो सके।
लेकिन इन दोनों आदेशों को दरकिनार करते हुए जिला पंचायत कबीरधाम द्वारा 22 दिसंबर 2025 को जारी आदेश में सहायक प्रोग्रामर दिलीप कुमार साहू को कार्यक्रम अधिकारी का अतिरिक्त प्रभार सौंप दिया गया। यह निर्णय सीधे तौर पर राज्य शासन के पूर्व निर्देशों के विपरीत माना जा रहा है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब शासन स्तर पर प्रभार देने की स्पष्ट प्रक्रिया निर्धारित है, तब आखिर किन परिस्थितियों में नियमों को नजरअंदाज कर यह आदेश जारी किया गया। मामले को लेकर पूर्व से शिकायतें और मनरेगा कार्यों में अनियमितताओं के आरोप सामने आते रहे हैं, लेकिन जिम्मेदारी तय करने के बजाय उन्हीं अधिकारियों को अतिरिक्त अधिकार दिए जाने से संरक्षण के आरोप और गहरे हो गए हैं।
प्रशासनिक हलकों में चर्चा है कि यदि शासन के आदेशों का पालन ही नहीं किया जाएगा, तो फिर जवाबदेही तय करने वाले नियम केवल कागजों तक ही सीमित रह जाएंगे। मनरेगा जैसी महत्वाकांक्षी योजना में नियमों की अनदेखी न केवल प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल खड़े करती है, बल्कि वित्तीय पारदर्शिता को भी प्रभावित करती है।
अब बड़ा प्रश्न यह है कि लगातार शिकायतों के बावजूद कार्रवाई क्यों नहीं हुई और आखिर किसके संरक्षण में नियमों को दरकिनार कर अतिरिक्त प्रभार सौंपने की व्यवस्था कायम रखी गई। यदि समय रहते इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच नहीं हुई, तो शासन की पारदर्शिता और जवाबदेही के दावों पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगना तय माना जा रहा है।

Related posts