5 से 55 किमी दूर मूल पदस्थापना, फिर भी आश्रम-छात्रावासों में जमे शिक्षक-कर्मचारी; संलग्नीकरण खत्म करने के आदेश पर सवाल
कवर्धा। राज्य सरकार और लोक शिक्षण संचालनालय के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद कबीरधाम जिले में शिक्षकों और गैरशिक्षकीय कर्मचारियों के संलग्नीकरण का मामला सवालों के घेरे में है। उपलब्ध आदेशों और सूची के अनुसार कुछ शिक्षक-कर्मचारी अपनी मूल पदस्थापना से 5 किलोमीटर से लेकर 55 किलोमीटर तक दूर स्थित आश्रम और छात्रावासों में कार्यरत बताए गए हैं। इनमें प्रधान पाठक, शिक्षक, सहायक शिक्षक और व्याख्याता स्तर के कर्मचारी शामिल हैं।
मामला इसलिए गंभीर है क्योंकि स्कूल शिक्षा विभाग और लोक शिक्षण संचालनालय ने संलग्नीकरण समाप्त कर सभी संबंधित कर्मचारियों को उनकी मूल पदस्थापना वाली संस्था अथवा कार्यालय में तत्काल कार्यमुक्त करने के निर्देश जारी किए हैं। इसके बाद भी यदि कर्मचारी मूल संस्था में वापस नहीं लौटे हैं तो सवाल उठता है कि आदेश के पालन की निगरानी किस स्तर पर हो रही है।
14 जुलाई के आदेश में दिए गए थे स्पष्ट निर्देश
लोक शिक्षण संचालनालय, छत्तीसगढ़ की ओर से 14 जुलाई 2026 को जारी आदेश क्रमांक एम.आई.एस./N-123/2026 में पूर्व में जारी निर्देशों का हवाला देते हुए शालाओं और कार्यालयों में कार्यरत शिक्षक एवं गैरशिक्षकीय कर्मचारियों की ऑनलाइन ऐप के माध्यम से उपस्थिति सुनिश्चित करने को कहा गया है।
आदेश में संलग्न सभी गैरशिक्षकीय कर्मचारियों का संलग्नीकरण समाप्त कर उन्हें तत्काल मूल पदस्थ संस्था या कार्यालय के लिए कार्यमुक्त करने के निर्देश दिए गए हैं। साथ ही मूल संस्था में ऑनलाइन उपस्थिति दर्ज कराना अनिवार्य बताया गया है।
निर्देशों का पालन नहीं करने पर कार्रवाई की चेतावनी भी दी गई है। आदेश के अनुसार संलग्नीकरण समाप्त होने के बाद भी यदि कर्मचारी मूल पदस्थ संस्था में उपस्थित नहीं होते और ऑनलाइन उपस्थिति दर्ज नहीं करते हैं तो इसे छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (आचरण) नियम, 1965 के नियम-3 के विपरीत कदाचार माना जा सकता है। ऐसे मामलों में वेतन रोकने और अनुशासनात्मक कार्रवाई की बात भी आदेश में कही गई है।
जिला शिक्षा अधिकारी ने भी जारी किया था आदेश
कबीरधाम जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय की ओर से 7 जुलाई 2026 को भी संलग्नीकरण समाप्त कर कर्मचारियों को मूल पदस्थापना में कार्यमुक्त करने संबंधी आदेश जारी किया गया था।
आदेश में संबंधित शिक्षक और कर्मचारियों को उनके मूल पदस्थ संस्था में तत्काल कार्यमुक्त करने तथा ऑनलाइन ऐप के माध्यम से उपस्थिति दर्ज कराने के निर्देश दिए गए थे। आदेश में यह भी स्पष्ट किया गया कि मूल संस्था में ऑनलाइन उपस्थिति दर्ज नहीं होने की स्थिति में जुलाई 2026 के वेतन आहरण में परेशानी हो सकती है।
5 से 55 किमी तक दूरी, सूची में कई नाम
उपलब्ध दस्तावेजों में संलग्न सूची में कर्मचारियों की मूल पदस्थापना, वर्तमान कार्यस्थल और दोनों संस्थाओं के बीच की दूरी का उल्लेख किया गया है। सूची के अनुसार कुछ कर्मचारी अपनी मूल संस्था से 5, 15, 20, 22, 25, 30, 52 और 55 किलोमीटर तक दूर स्थित आश्रम या छात्रावासों में कार्यरत बताए गए हैं।
इनमें कई कर्मचारियों की मूल पदस्थापना शासकीय प्राथमिक, पूर्व माध्यमिक और हाईस्कूलों में बताई गई है, जबकि वर्तमान में वे आदिवासी बालक आश्रम, आदिवासी कन्या आश्रम, बालक छात्रावास और कन्या छात्रावासों में अधीक्षक अथवा अन्य दायित्व निभाते बताए जा रहे हैं।
मूल स्कूलों में पढ़ाई पर पड़ सकता है असर
शिक्षकों को लंबे समय तक मूल विद्यालयों से अलग रखकर गैरशिक्षकीय दायित्व दिए जाने से संबंधित विद्यालयों में शिक्षकों की उपलब्धता और पढ़ाई की व्यवस्था प्रभावित होने की आशंका है। खासकर ग्रामीण और वनांचल क्षेत्रों के स्कूलों में शिक्षकों की संख्या पहले से ही महत्वपूर्ण मुद्दा रही है।
ऐसे में शासन के निर्देश के बाद भी यदि शिक्षक मूल विद्यालयों में वापस नहीं पहुंचे हैं तो पूरे मामले की वास्तविक स्थिति सामने आना जरूरी है।
अब जिम्मेदारी तय करने की मांग
मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि शासन और लोक शिक्षण संचालनालय के स्पष्ट निर्देशों के बाद भी यदि संलग्न शिक्षक-कर्मचारी आश्रम एवं छात्रावासों में कार्यरत हैं तो इसकी जिम्मेदारी किसकी है? क्या संबंधित कर्मचारियों को विधिवत कार्यमुक्त किया गया था या नहीं? यदि कार्यमुक्त किया गया तो उन्होंने मूल संस्था में ज्वाइन क्यों नहीं किया? और यदि वे अब भी छात्रावासों में कार्यरत हैं तो उन्हें किस आदेश के तहत वहां जिम्मेदारी दी गई है?
इन सवालों के जवाब के लिए संबंधित शिक्षकों-कर्मचारियों की मूल पदस्थापना, वर्तमान कार्यस्थल, संलग्नीकरण आदेश, कार्यमुक्ति आदेश, ऑनलाइन उपस्थिति और जुलाई 2026 के वेतन आहरण की जांच आवश्यक है।
यदि जांच में शासन के आदेशों की अवहेलना सामने आती है तो संबंधित जिम्मेदार अधिकारी-कर्मचारियों पर नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए। साथ ही यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि मूल पदस्थापना वाले विद्यालयों से शिक्षकों को आश्रम-छात्रावासों में किस आधार पर और कितने समय तक रखा गया।
अब देखना होगा कि जिला प्रशासन और शिक्षा विभाग इस मामले की जांच कर शासन के संलग्नीकरण समाप्त करने के आदेश का वास्तविक पालन सुनिश्चित कराते हैं या नहीं।