पत्रकारिता में सत्य, लोकमंगल और विश्वसनीयता जरूरी: रायपुर में भारतीय संस्कृति और मीडिया की चुनौतियों पर परिचर्चा

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भारतीय ज्ञान परंपरा और पत्रकारिता की चुनौतियों पर हुआ मंथन, वक्ताओं ने कहा—संस्कृति, सत्यता और विश्वसनीयता ही मीडिया की ताकत
रायपुर, 10 अगस्त 2026। भारतीय ज्ञान परंपरा, संस्कृति और जीवन मूल्यों को पत्रकारिता से जोड़ने तथा बदलते तकनीकी दौर में मीडिया के सामने मौजूद चुनौतियों पर चर्चा के लिए छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग एवं कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय (केटीयू), रायपुर के संयुक्त तत्वावधान में एकदिवसीय परिचर्चा गोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का विषय “भारतीय संस्कृति, जीवन मूल्य अउ पत्रकारिता: आज के चुनौती-कली बर दिशा” रखा गया। परिचर्चा में प्रबुद्ध वक्ताओं ने भारतीय संस्कृति और ज्ञान परंपरा को पत्रकारिता के लिए मार्गदर्शक बताते हुए सत्यता, लोकमंगल और विश्वसनीयता को मीडिया का मूल आधार बताया।
कार्यक्रम के शुभारंभ में छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग की सचिव डॉ. अभिलाषा बेहार ने स्वागत भाषण दिया। उन्होंने आयोग की कार्यप्रणाली और विभिन्न योजनाओं की जानकारी उपस्थित लोगों के साथ साझा की।
मुख्य वक्ता एवं विख्यात विचारक प्रवीण गुगनानी ने कहा कि छत्तीसगढ़ी भाषा में अपनापन है और भारत की सांस्कृतिक परंपरा में छत्तीसगढ़ का विशेष स्थान है। उन्होंने कहा कि संस्कृति के बिना भारत की कल्पना अधूरी है और वर्तमान समय में पत्रकारिता को सांस्कृतिक मूल्यों से जोड़ना बेहद जरूरी है। उन्होंने कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई के बढ़ते प्रभाव का उल्लेख करते हुए कहा कि तकनीक का उपयोग करते समय अपनी सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखना आवश्यक है। उन्होंने युवाओं से संस्कृति और परंपराओं से जुड़कर प्रतिबद्धता एवं मनोयोग के साथ आगे बढ़ने का आह्वान किया।
न्यूज़-24 के एडिटोरियल डायरेक्टर मनोज सिंह बघेल ने बदलती तकनीक और पत्रकारिता के स्वरूप पर विचार रखते हुए कहा कि आज मीडिया का परिदृश्य तेजी से बदल रहा है। टेक्नोलॉजी और एआई पत्रकारिता के लिए सकारात्मक अवसरों के साथ नई चुनौतियां भी लेकर आए हैं। चैटजीपीटी जैसे आसानी से उपलब्ध प्लेटफॉर्म के दौर में पत्रकारों के सामने तथ्यपरक, विश्वसनीय और मौलिक पत्रकारिता को बनाए रखने की बड़ी चुनौती है।
राष्ट्रवादी विचारक ललित शर्मा ने समाचारों की भाषा को लेकर कहा कि पत्रकारिता ऐसी भाषा में होनी चाहिए, जिसे आम जनता सहजता से समझ सके। क्षेत्रीय शब्दों का विवेकपूर्ण इस्तेमाल समाचारों को अधिक प्रभावी और जनसरोकार से जोड़ता है। उन्होंने पत्रकारिता के प्रमुख सूत्र सत्य, लोकमंगल और विश्वसनीयता को बताते हुए संवाद, समन्वय और नीति को भी आवश्यक तत्व बताया।
वरिष्ठ शिक्षाविद सुरेश देशमुख ने कहा कि समाचारों के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन की व्यापक संभावनाएं होती हैं। पत्रकारिता समाज की सोच और दिशा को प्रभावित करने की क्षमता रखती है। ऐसे में सभ्यता और संस्कृति में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए जिम्मेदार पत्रकारिता की महत्वपूर्ण भूमिका है।
छत्तीसगढ़ी भाषा एवं साहित्य के संवर्धन के लिए कार्यरत राजभाषा आयोग के अध्यक्ष प्रभात मिश्रा ने कहा कि छत्तीसगढ़ी संस्कृति और भाषा को सही दिशा देने वाले हर प्रयास में आयोग पूरा सहयोग करेगा। वहीं, सिंधी अकादमी की सुषमा जेठानी ने संस्कृति को समाज की जड़ बताते हुए कहा कि मीडिया को ऐसी खबरों को प्राथमिकता देनी चाहिए, जिन्हें परिवार के साथ बैठकर देखा और पढ़ा जा सके।
केटीयू के कुलपति प्रो. मनोज दयाल ने आयोजन के लिए शुभकामनाएं प्रेषित करते हुए कहा कि विश्वविद्यालय भविष्य में भी इस तरह के आयोजनों के माध्यम से छत्तीसगढ़ी भाषा और साहित्य को समृद्ध करने के लिए प्रतिबद्ध रहेगा।
कार्यक्रम का संचालन विज्ञापन एवं जनसंपर्क विभाग की छात्रा तारणी सोनी ने किया। कार्यक्रम के अंत में केटीयू के कुलसचिव सुनील कुमार शर्मा ने अतिथियों को प्रतीक चिन्ह भेंट कर आभार व्यक्त किया। गोष्ठी के समन्वयक डॉ. आशुतोष मंडावी रहे। इस अवसर पर विश्वविद्यालय के प्राध्यापक, कर्मचारी एवं बड़ी संख्या में विद्यार्थी उपस्थित रहे।

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