परंपरा की जड़ों की ओर: सुदूर वनांचल में अक्षय तृतीया पर ‘करसी’ दान की अनूठी रस्म
आधुनिकता के इस दौर में जहाँ त्योहारों का स्वरूप बदल रहा है, वहीं छत्तीसगढ़ के सुदूर वनांचल क्षेत्रों में आज भी प्राचीन परंपराएं अपनी पूरी पवित्रता के साथ जीवित हैं। अक्षय तृतीया (अक्ती) के पावन अवसर पर वनांचल की सड़कों और हाट-बाजारों में एक अद्भुत नजारा देखने को मिल रहा है। यहाँ मिट्टी से बनी विशेष पात्र ‘करसी’ लेने के लिए श्रद्धालुओं और ग्रामीणों की भारी भीड़ उमड़ पड़ी है। मान्यता है कि इस दिन मिट्टी की नई करसी में दान-पुण्य करने से अक्षय फल की प्राप्ति होती है।
भांचा-भांची के पूजन की पुरातन परंपरा
वनांचल की इस लोक संस्कृति में भांचा-भांची (भांजे-भांजी) को साक्षात भगवान का रूप माना जाता है। अक्षय तृतीया के दिन मामा अपने भांजे-भांजियों के घर जाकर उन्हें मिट्टी की नई करसी भेंट करते हैं। इस करसी में श्रद्धा अनुसार दाल, चावल, नमक और सूखी मिर्ची जैसे दैनिक उपयोग की आवश्यक वस्तुएं रखी जाती हैं।
परंपरा केवल दान तक सीमित नहीं है; उपहार देने के बाद मामा अपने भांचा-भांची के पैर धोकर उन्हें प्रणाम करते हैं और उनका आशीर्वाद लेते हैं। बुजुर्गों का कहना है कि यह रीति-रिवाज सदियों पुराना है, जो रिश्तों में सम्मान और प्रेम की गहराई को दर्शाता है।
साइकिल पर बंधा रिश्तों का कारवां
यातायात के सीमित साधनों और दुर्गम रास्तों के बावजूद ग्रामीणों के उत्साह में कोई कमी नहीं दिख रही है। लोग अपनी साइकिलों पर कपड़े की मदद से करसी को बड़ी सावधानी से बांधकर मीलों का सफर तय कर रहे हैं। कोई साइकिल के हैंडल पर तो कोई पीछे के कैरियर पर अगल-बगल करसी लटकाए अपने भांजे के घर की ओर बढ़ रहा है। यह दृश्य न केवल आस्था का प्रतीक है, बल्कि यह भी बताता है कि अपनी जड़ों से जुड़े रहने के लिए संसाधन कभी बाधा नहीं बनते



