प्रशासनिक संलग्नीकरण की आड़ में चरमराई व्यवस्था, जनपद पंचायत सहसपुर लोहारा में गुणवत्ता पर उठने लगे गंभीर सवाल
कवर्धा। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) जैसी महत्वाकांक्षी योजना, जिसका उद्देश्य ग्रामीणों को रोजगार उपलब्ध कराने के साथ गांवों में टिकाऊ परिसंपत्तियों का निर्माण करना है, अब कबीरधाम जिले में प्रशासनिक अव्यवस्था और जिम्मेदारियों के असंतुलन की भेंट चढ़ती दिखाई दे रही है। जिला पंचायत द्वारा 16 अक्टूबर 2025 में जारी एक आदेश के तहत सहसपुर लोहारा जनपद पंचायत में पदस्थ कार्यक्रम अधिकारी को “प्रशासनिक व्यवस्था एवं कार्य संचालन” के नाम पर जिला पंचायत में संलग्न कर दिया गया था। आदेश में यह भी स्पष्ट उल्लेख है कि उक्त व्यवस्था आगामी आदेश तक प्रभावशील रहेगी।
लेकिन सवाल यह उठ रहा है कि आखिर “अस्थायी संलग्नीकरण” कब स्थायी व्यवस्था में बदल गया। आदेश जारी होने के महीनों बाद भी संबंधित अधिकारी जिला पंचायत में संलग्न हैं, जबकि सहसपुर लोहारा जनपद पंचायत का कामकाज कथित रूप से प्रोग्रामर के भरोसे संचालित किया जा रहा है। मिली जानकारी अनुसार, प्रोग्रामर को अपने मूल तकनीकी दायित्वों के साथ-साथ कार्यक्रम अधिकारी की प्रशासनिक जिम्मेदारियां भी निभानी पड़ रही हैं। इसका सीधा असर मनरेगा सहित ग्रामीण विकास कार्यों की गुणवत्ता और निगरानी व्यवस्था पर पड़ता दिखाई दे रहा है।
ग्रामीण क्षेत्रों में बन रहे चैक डैम, स्टॉप डैम, रिटर्निंग वाल, मिट्टी कार्य, जल संरक्षण संरचनाएं और अन्य विकास कार्यों में गुणवत्ता को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि तकनीकी परीक्षण, माप पुस्तिका सत्यापन, कार्यस्थल निरीक्षण और समयबद्ध मॉनिटरिंग जैसी महत्वपूर्ण प्रक्रियाएं प्रभावित हो रही हैं। कई पंचायतों में कार्य पूर्ण होने के बाद भी गुणवत्ता परीक्षण केवल कागजों तक सीमित बताया जा रहा है।
मनरेगा संचालन के लिए केंद्र सरकार द्वारा जारी महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम 2005 तथा उसके संचालन दिशा-निर्देशों में स्पष्ट प्रावधान है कि योजना के क्रियान्वयन हेतु प्रशासनिक एवं तकनीकी तंत्र अलग-अलग जिम्मेदारियों के साथ कार्य करेगा, ताकि पारदर्शिता और जवाबदेही बनी रहे। कार्यक्रम अधिकारी का दायित्व केवल फाइल संचालन तक सीमित नहीं होता, बल्कि कार्यों की निगरानी, शिकायत निवारण, सामाजिक अंकेक्षण समन्वय, भुगतान प्रक्रिया की निगरानी और गुणवत्ता नियंत्रण भी उसी के अधीन आता है।
ऐसे में यदि किसी जनपद पंचायत से कार्यक्रम अधिकारी को हटाकर जिला स्तर पर संलग्न कर दिया जाए और महीनों तक वैकल्पिक व्यवस्था भी न बनाई जाए, तो यह सीधे तौर पर शासन की मंशा और योजना संचालन की मूल भावना पर प्रश्न खड़ा करता है। प्रशासनिक विशेषज्ञों का मानना है कि एक तकनीकी कर्मचारी पर दोहरी जिम्मेदारी डालना न केवल सेवा नियमों की भावना के विपरीत है, बल्कि इससे कार्य की निष्पक्षता और गुणवत्ता दोनों प्रभावित होती हैं।
छत्तीसगढ़ पंचायत सेवा (आचरण) नियम तथा प्रशासनिक कार्य विभाजन संबंधी दिशा-निर्देशों में भी यह व्यवस्था दी गई है कि किसी अधिकारी या कर्मचारी को अतिरिक्त प्रभार केवल सीमित परिस्थितियों और सीमित अवधि के लिए दिया जा सकता है। लेकिन सहसपुर लोहारा जनपद पंचायत में स्थिति इसके उलट दिखाई दे रही है, जहां स्थायी पद रिक्त जैसी स्थिति निर्मित हो गई है।
ग्रामीणों और जनप्रतिनिधियों के बीच यह चर्चा तेज है कि आखिर जिला पंचायत स्तर पर ऐसी कौन-सी प्रशासनिक आवश्यकता है, जिसके कारण जनपद पंचायत का पूरा संचालन प्रभावित होने दिया जा रहा है। सवाल यह भी उठ रहा है कि यदि जिला पंचायत में अधिकारियों की कमी थी तो वैकल्पिक पदस्थापना क्यों नहीं की गई। क्या शासन स्तर से इसकी अनुमति ली गई और यदि ली गई तो अब तक नई पदस्थापना क्यों नहीं हुई।
मनरेगा जैसी योजना में पारदर्शिता और गुणवत्ता बनाए रखने के लिए केंद्र एवं राज्य सरकार समय-समय पर मॉनिटरिंग, सोशल ऑडिट और फिजिकल वेरिफिकेशन पर जोर देती रही है। बावजूद इसके, कबीरधाम जिले में प्रशासनिक संलग्नीकरण की यह व्यवस्था अब गंभीर सवालों के घेरे में आ गई है।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जब जिम्मेदार अधिकारी जिला पंचायत में संलग्न हैं और जनपद पंचायत में कार्यों का संचालन अतिरिक्त प्रभार के भरोसे चल रहा है, तब चैक डैम, स्टॉप डैम, रिटर्निंग वाल और अन्य निर्माण कार्यों की गुणवत्ता तथा जवाबदेही सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी आखिर किसकी है।