लोखान में 30 मीटर गहरी खुदाई का खेल! श्याम तंबोली की पट्टा खदान में सुरक्षा शून्य, रॉयल्टी पर सवाल
कवर्धा ,
ग्राम लोखान, तहसील कुकदूर अंतर्गत संचालित पट्टा खदान, जिसके पट्टाधारी श्याम तंबोली बताए जा रहे हैं, वहां खनन नियमों की खुली अनदेखी का मामला सामने आया है। स्थल पर लगभग 30 मीटर तक गहरी खुदाई की जा चुकी है, जबकि नियमानुसार सीमित गहराई, चरणबद्ध उत्खनन और सुरक्षित ढलान (स्लोप) का पालन अनिवार्य होता है। जमीनी हालात संकेत दे रहे हैं कि तय मापदंडों को ताक पर रखकर खनन कार्य किया गया है।
सुरक्षा घेरा नदारद, हादसे का इंतजार
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि खदान क्षेत्र के चारों ओर किसी प्रकार की मजबूत फेंसिंग या सुरक्षा घेरा नहीं लगाया गया है। ग्रामीण क्षेत्र होने के कारण मवेशी और अन्य जानवर खुले में विचरण करते हैं। ऐसे में 30 मीटर गहरा खुला गड्ढा किसी भी समय जानलेवा साबित हो सकता है। यदि किसी मवेशी या ग्रामीण की गिरकर मृत्यु होती है, तो इसकी जवाबदेही आखिर किसकी होगी।
पट्टाधारी श्याम तंबोली की, ग्राम पंचायत की, या खनिज एवं राजस्व विभाग की ।
खनन अधिनियमों और सुरक्षा प्रावधानों के अनुसार, खदान स्थल पर चेतावनी बोर्ड, सीमांकन, सुरक्षित ढलान और चारों ओर घेरा अनिवार्य है। मौके पर इन प्रावधानों का अभाव प्रशासनिक निगरानी पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है।
तय मापदंडों से अधिक खुदाई
खदानों में गहराई निर्धारित शर्तों के अनुरूप ही बढ़ाई जा सकती है और प्रत्येक चरण में निरीक्षण आवश्यक होता है। लगभग 30 मीटर की खुदाई यह संकेत देती है कि या तो लगातार निगरानी नहीं हुई या फिर नियमों की अनदेखी को मौन स्वीकृति मिली। यदि पट्टा शर्तों में निर्धारित गहराई से अधिक उत्खनन किया गया है, तो यह स्पष्ट उल्लंघन की श्रेणी में आएगा।
निकले पत्थरों की रॉयल्टी पर सन्नाटा
स्थानीय स्तर पर बड़ी मात्रा में पत्थर निकाले जाने की चर्चा है साथ ही खुदाई की गई गड्ढा उसका सबूत भी है।नियमानुसार प्रत्येक घनमीटर खनिज पर शासन को निर्धारित रॉयल्टी जमा करना अनिवार्य है।
सवाल यह उठता है कि अब तक कितनी मात्रा में पत्थर निकाले गए और उसके अनुपात में कितनी रॉयल्टी जमा की गई। क्या खनिज विभाग ने भौतिक सत्यापन कर वास्तविक उत्खनन की माप की है।
यदि उत्खनन और रॉयल्टी के आंकड़ों में अंतर पाया जाता है, तो यह शासकीय राजस्व को सीधी क्षति मानी जाएगी। ऐसे मामलों में खनिज निरीक्षक, खनिज अधिकारी और संबंधित राजस्व अमले की भूमिका भी जांच के दायरे में आती है।
पर्यावरण और ग्रामीण हितों की अनदेखी
गहरी खुदाई से भू-क्षरण, जलस्तर में गिरावट और आसपास की भूमि की स्थिरता पर असर पड़ सकता है। बिना सुरक्षा प्रबंधन के खुले गड्ढे पर्यावरणीय और सामाजिक दोनों दृष्टि से खतरा हैं। पर्यावरणीय स्वीकृति की शर्तों में खदान क्षेत्र की सुरक्षा, पुनर्भरण (रीक्लेमेशन) और वृक्षारोपण जैसे प्रावधान होते हैं। यदि इनका पालन नहीं किया गया, तो यह गंभीर लापरवाही मानी जाएगी।
जिम्मेदारी तय हो, कार्रवाई कब
यह मामला केवल एक खदान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रशासनिक जवाबदेही की परीक्षा है। जिला प्रशासन को चाहिए कि संयुक्त टीम बनाकर स्थल का पुनः मापन कराए, रॉयल्टी का ऑडिट करे और सुरक्षा मानकों की तत्काल समीक्षा करे।
यदि अनियमितता प्रमाणित होती है, तो पट्टा निरस्तीकरण, जुर्माना और दंडात्मक कार्रवाई जैसे कठोर कदम उठाए जाने चाहिए। जब तक जिम्मेदारों पर कार्रवाई नहीं होगी, तब तक ग्रामीण क्षेत्रों में खनन के नाम पर मनमानी और जोखिम का यह सिलसिला जारी रहेगा।
लोखान की यह पट्टा खदान अब केवल उत्खनन का स्थल नहीं, बल्कि प्रशासनिक निष्क्रियता और नियमों की अनदेखी का प्रतीक बनती जा रही है।