लोखान खदान बना खतरे का गड्ढा! 30 मीटर खुदाई, अंधाधुंध ब्लास्टिंग से जलस्तर गिरा, मकानों में दरारें और वन्यजीवों पर संकट

lok sev
IMG-20260114-WA0060
previous arrow
next arrow
लोखान खदान बना खतरे का गड्ढा! 30 मीटर खुदाई, अंधाधुंध ब्लास्टिंग से जलस्तर गिरा, मकानों में दरारें और वन्यजीवों पर संकट
कवर्धा ,
पंडरिया विधानसभा के कुकदूर के समीप ग्राम लोखान में संचालित श्याम तंबोली की पट्टा खदान को लेकर उठ रहे सवाल अब केवल अवैध गहराई या सुरक्षा घेरा न होने तक सीमित नहीं रह गए हैं। मामला अब पर्यावरणीय असंतुलन, ग्रामीण जनजीवन पर प्रतिकूल प्रभाव और वन्यजीवों की सुरक्षा तक पहुंच गया है। लगभग 30 मीटर गहरी खुदाई और लगातार हो रही हैवी ब्लास्टिंग ने पूरे क्षेत्र को दहशत और अनिश्चितता के माहौल में धकेल दिया है।
जलस्तर में गिरावट: सूखते स्रोत, बढ़ती चिंता
ग्रामीणों का आरोप है कि खदान की अत्यधिक गहराई के कारण आसपास के जल स्रोतों का स्तर तेजी से नीचे चला गया है। कई कुएं और हैंडपंप पहले की तुलना में कम पानी दे रहे हैं। मिली जानकारी अनुसार, गहरी खुदाई से भू-जल धारण क्षमता प्रभावित होती है और जलस्तर असंतुलित हो सकता है।
पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 तथा खनन पट्टा शर्तों के तहत भू-जल संरक्षण, रेन वाटर मैनेजमेंट और रिचार्ज प्लान अनिवार्य होते हैं।
यदि उत्खनन से जल स्रोतों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है और उसका पूर्व आकलन या शमन उपाय नहीं किया गया, तो यह स्पष्ट उल्लंघन की श्रेणी में आएगा। सवाल यह है कि क्या भू-जल सर्वे कराया गया। क्या जल संरक्षण की कोई प्रभावी योजना लागू है।
हैवी ब्लास्टिंग से कांप रहे मकान
खदान में बड़े पैमाने पर की जा रही हैवी ब्लास्टिंग को लेकर भी ग्रामीणों में आक्रोश है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि विस्फोट के समय घरों की दीवारें हिलने लगती हैं और कई मकानों में दरारें तक पड़ चुकी हैं।
खनिज नियमों, विस्फोटक अधिनियम, 1884 और संबंधित सुरक्षा मानकों के अनुसार ब्लास्टिंग नियंत्रित मात्रा में, निर्धारित समय और कंपन सीमा (वाइब्रेशन लिमिट) के भीतर ही की जानी चाहिए। आबादी क्षेत्र से सुरक्षित दूरी बनाए रखना अनिवार्य है। यदि कंपन सीमा का परीक्षण (वाइब्रेशन मॉनिटरिंग) नहीं किया गया या मानकों से अधिक विस्फोट किए गए, तो यह गंभीर लापरवाही मानी जाएगी।
ग्रामीणों का सवाल है कि क्या संबंधित विभागों ने ब्लास्टिंग का तकनीकी निरीक्षण किया। क्या कंपन मापने के उपकरणों से निगरानी की जा रही है। यदि नहीं, तो यह केवल पट्टाधारी ही नहीं बल्कि निगरानी तंत्र की भी जवाबदेही तय करता है।
वन क्षेत्र नजदीक, वन्यजीवों पर खतरा
खदान से कुछ दूरी पर वन क्षेत्र स्थित है। लगातार तेज धमाकों और ध्वनि प्रदूषण से वन्यजीवों के प्राकृतिक व्यवहार पर असर पड़ सकता है। वन विशेषज्ञों का मानना है कि अत्यधिक शोर और कंपन से जंगली जानवर दिशा भ्रमित होकर आबादी की ओर आ सकते हैं, जिससे मानव-वन्यजीव संघर्ष की स्थिति बनती है।
वन संरक्षण अधिनियम, 1980 और पर्यावरणीय स्वीकृति की शर्तों के तहत वन क्षेत्र के निकट खनन गतिविधियों में विशेष सतर्कता अनिवार्य है। यदि वन विभाग से आवश्यक अनुमति, दूरी मानक और प्रभाव आकलन रिपोर्ट (EIA) का पालन नहीं किया गया, तो यह गंभीर प्रशासनिक चूक मानी जाएगी।
जवाबदेही से नहीं बच सकता कोई
लोखान की यह खदान अब केवल एक स्थानीय मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह प्रशासनिक पारदर्शिता और नियम पालन की परीक्षा बन चुका है। खनिज विभाग, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, राजस्व विभाग और वन विभाग—सभी की भूमिका जांच के दायरे में है।
क्या संयुक्त निरीक्षण हुआ , क्या जलस्तर, कंपन और ध्वनि स्तर का वैज्ञानिक परीक्षण कराया गया। क्या प्रभावित ग्रामीणों की शिकायतों का संज्ञान लिया गया।
ग्रामीणों की मांग है कि स्वतंत्र तकनीकी टीम गठित कर स्थल का सर्वे कराया जाए, जल स्रोतों की स्थिति का आकलन हो, मकानों में आई दरारों की जांच कर मुआवजा तय किया जाए और ब्लास्टिंग पर तत्काल नियंत्रण लगाया जाए। यदि अनियमितता सिद्ध होती है, तो पट्टा निरस्तीकरण, आर्थिक दंड और दंडात्मक कार्रवाई जैसे कठोर कदम उठाए जाएं।
लोखान की यह खदान विकास के नाम पर विनाश का प्रतीक बनती जा रही है। यदि समय रहते ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तो इसका असर केवल जमीन और जंगल तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के संसाधनों और सुरक्षा पर भी भारी पड़ेगा।

Related posts